रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 3 — रामराज्य में सर्वत्र सुख-संतोष, कल्पवृक्ष समान वृक्ष और कामधेनु समान पृथ्वी; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। षष्ठम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह तीसरा दोहा है; परदेस गए व्यक्ति के लौटने से जुड़े प्रश्नों में यह सर्ग विशेष देखा जाता है।
रामराज्य में सर्वत्र सुख-संतोष — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास। तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास॥३॥
शब्दार्थ:
- संतोष सुख = सुख और संतोष
- घर बन = घर और वन में
- सकल सुपास = सब प्रकार की सुविधा
- तरु सुरतरु = वृक्ष कल्पवृक्ष के समान
- सुरधेनु महि = पृथ्वी कामधेनु के समान
- अभिमत = मनचाहा
- भोग बिलास = भोग और सुख
राम राज संतोष सुख, घर बन सकल सुपास = रामराज्य में सुख-संतोष और सर्वत्र सुविधा है। तरु सुरतरु सुरधेनु महि = वृक्ष कल्पवृक्ष और पृथ्वी कामधेनु के समान है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम के राज्य में सर्वत्र सुख-संतोष है और घर में तथा वन में — सब कहीं सब प्रकार की सुविधा है। वहाँ वृक्ष कल्पवृक्ष के समान और पृथ्वी कामधेनु के समान मनचाहा भोग-विलास देती है।
‘संतोष सुख’ शब्द-युग्म महत्वपूर्ण है। सुख बाहरी है और संतोष भीतरी। रामराज्य की विशेषता यह थी कि वहाँ दोनों थे।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा समृद्धि और संतुष्टि दोनों का सूचक है। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ आर्थिक स्थिति या जीवन की गुणवत्ता विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है और सुख-संतोष दोनों का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- आर्थिक समृद्धि और जीवन की गुणवत्ता
- मन की संतुष्टि और शांति
- घर, भूमि, खेती या संपत्ति से लाभ
- मनचाही वस्तु या सुविधा की प्राप्ति
- सर्वत्र अनुकूल परिस्थितियाँ
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। सुख और संतोष दोनों मिलेंगे — यह दुर्लभ संयोग है।
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