रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — विभीषण की शरणागति और श्रीराम द्वारा तत्काल लंका का राजतिलक; शुभ प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में पंचम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रयत्न मत छोड़ो, मार्ग निकल आएगा।
विभीषण की शरणागति और राजतिलक — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: पाहि पाहि असरन सरन, प्रनतपाल रघुराज। दियो तिलक लंकेस कहि राम गरिब नेवाज॥१॥
शब्दार्थ:
- पाहि पाहि = रक्षा करो, रक्षा करो
- असरन सरन = अशरण के शरण
- प्रनतपाल = शरणागत के रक्षक
- दियो तिलक = राजतिलक कर दिया
- लंकेस = लंकापति
- गरिब नेवाज = दीनों पर कृपा करने वाले
पाहि पाहि असरन सरन = हे अशरण के शरण, रक्षा करो। दियो तिलक लंकेस कहि = लंकेश कहकर राजतिलक कर दिया।
भावार्थ / व्याख्या:
विभीषणजी ने श्रीराम के पास जाकर कहा — ‘हे अशरणशरण, शरणागत रक्षक श्रीरघुनाथजी! रक्षा करो, रक्षा करो!’ यह सुनकर दीनों पर कृपा करने वाले श्रीराम ने विभीषण को लंकेश कहकर तत्काल राजतिलक कर दिया।
यह प्रसंग शरणागति की महिमा का सर्वोच्च उदाहरण है। विभीषण ने केवल शरण माँगी थी, राज्य नहीं। परंतु श्रीराम ने बिना माँगे ही लंका का राज्य दे दिया — और वह भी युद्ध जीतने से पहले।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को शुभ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अत्यंत अनुकूल है जहाँ किसी से सहायता या शरण माँगनी हो। संदेश यह है कि जो सच्चे मन से शरण माँगता है, उसे अपेक्षा से कहीं अधिक मिलता है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- किसी से सहायता, शरण या संरक्षण माँगना
- पद, अधिकार या राज्य की प्राप्ति
- गलत पक्ष छोड़कर सही मार्ग अपनाना
- अपेक्षा से अधिक मिलने की संभावना
- किसी बड़े व्यक्ति की कृपा या अनुग्रह
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। सच्चे मन से सहायता माँगें — अपेक्षा से कहीं अधिक मिलेगा।
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