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रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 3 — भलाई की सीमा और शील-स्नेह के निधान भरतजी; कल्याण सूचित करने वाला शकुन।

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शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। यह दोहा पंचम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से तीसरा है — यहाँ भक्ति, बल और बुद्धि तीनों का संयोग है।

भरतजी भलाई की सीमा — यह शकुन कल्याण सूचित करता है।

मूल दोहा: भरत भलाई की अवधि, सील सनेह निधान। धरम भगति भायप समय, सगुन कहब कल्यान॥३॥

शब्दार्थ:

  • भलाई की अवधि = अच्छाई की सीमा
  • सील = शील
  • सनेह निधान = स्नेह के भंडार
  • धरम = धर्म
  • भगति = भक्ति
  • भायप = भ्रातृभाव
  • समय = इस समय का
  • कल्यान = कल्याण

भरत भलाई की अवधि, सील सनेह निधान = भरतजी अच्छाई की सीमा और शील-स्नेह के भंडार हैं। सगुन कहब कल्यान = यह शकुन कल्याण सूचित करता है।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीभरतलालजी अच्छाई की सीमा हैं, शील और स्नेह के निधान हैं, धर्मात्मा हैं और भ्रातृभाव से भक्ति करने वाले हैं। इस समय का शकुन कल्याण सूचित करता है।

‘भलाई की अवधि’ अर्थात् अच्छाई की सीमा — इससे आगे अच्छाई संभव नहीं। तुलसीदास जी भरतजी के लिए यह सर्वोच्च प्रशंसा प्रयोग करते हैं।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा कल्याण का सूचक है। यह विशेषकर उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ धर्म, नैतिकता और भाईचारे का प्रश्न हो। संदेश यह भी है कि इस समय भलाई और ईमानदारी का मार्ग ही सबसे लाभकारी है।

शकुन फल:

यह शकुन कल्याण सूचित करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:

  • धर्म, नैतिकता या ईमानदारी से जुड़ा निर्णय
  • भाई-बहनों और परिवार का संबंध
  • किसी के प्रति निःस्वार्थ सेवा या भक्ति
  • शील और सद्व्यवहार से बनने वाला काम
  • किसी अच्छे व्यक्ति से सहयोग

इस दोहे के आने पर कल्याण का संकेत है। भलाई और ईमानदारी का मार्ग ही इस समय सबसे लाभकारी रहेगा।

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