रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 5 श्लोक 1 — सीताजी के प्राकट्य से जनकपुर में सुख-संपत्ति की निरंतर वृद्धि; उन्नति सूचक शुभ शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। चतुर्थ सर्ग के पाँचवें सप्तक का पहला दोहा प्रस्तुत है, जिसमें उत्सव, विवाह और मंगल-कार्य के शकुन देखे जाते हैं।
सीताजी के प्राकट्य से जनकपुर की निरंतर वृद्धि — सुख-संपत्ति और उन्नति।
मूल दोहा: जनकनंदिनी जनकपुर जब तें प्रगटीं आइ। तब तें सब सुखसंपदा अधिक अधिक अधिकाइ॥१॥
शब्दार्थ:
- जनकनंदिनी = जनक की पुत्री (सीताजी)
- जब तें = जब से
- प्रगटीं = प्रकट हुईं
- तब तें = तब से
- सुखसंपदा = सुख और संपत्ति
- अधिक अधिक = अधिकाधिक
- अधिकाइ = बढ़ती जाती हैं
जनकनंदिनी जनकपुर जब तें प्रगटीं आइ = जब से सीताजी जनकपुर में प्रकट हुईं। सब सुखसंपदा अधिक अधिक अधिकाइ = सभी सुख-संपत्तियाँ अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
जब से जनकपुर में श्रीसीताजी आकर प्रकट हुईं, तब से वहाँ सभी सुख एवं संपत्तियाँ दिनोंदिन अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं।
‘अधिक अधिक अधिकाइ’ में तुलसीदास जी ने एक ही शब्द को तीन बार प्रयोग करके निरंतर वृद्धि का भाव उत्पन्न किया है।
यह दोहा एक महत्वपूर्ण बात बताता है — कुछ लोगों या घटनाओं का आना पूरे वातावरण की समृद्धि बढ़ा देता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा सुख-संपत्ति की प्राप्ति तथा निरंतर उन्नति की सूचना देता है, विशेषकर कन्या या स्त्री के घर में आने से जुड़े प्रश्नों में।
शकुन फल:
यह शकुन सुख-संपत्ति और निरंतर उन्नति की सूचना देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- घर में कन्या या नववधू का आगमन
- धन, संपत्ति और समृद्धि में वृद्धि
- व्यापार या आय में निरंतर बढ़ोतरी
- किसी नए सदस्य के आने से होने वाला लाभ
- लगातार बेहतर होती जा रही स्थिति
इस दोहे के आने पर सुख-संपत्ति और निरंतर उन्नति का संकेत है। जो वृद्धि आरंभ हुई है वह रुकेगी नहीं, बढ़ती जाएगी।
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