रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 5 — हनुमानजी को उत्तम स्वामी और प्रभु को उत्तम सेवक की प्राप्ति; स्वामी-सेवक संबंधों में शुभ फल।

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तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। तृतीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का पाँचवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसके दोहे बताते हैं कि सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है।

स्वामी और सेवक दोनों को लाभ — स्वामी-सेवक संबंधी प्रश्नों में शुभ फल।

मूल दोहा: राम लखन हनुमान मन, दुहूँ दिसि परम उछाहु। मिला सुसाहिब सेवकहि, प्रभुहि सुसेवक लाहु॥५॥

शब्दार्थ:

  • दुहूँ दिसि = दोनों ओर
  • परम उछाहु = परम उत्साह
  • मिला = मिला
  • सुसाहिब = उत्तम स्वामी
  • सेवकहि = सेवक को
  • प्रभुहि = प्रभु को
  • सुसेवक = उत्तम सेवक
  • लाहु = लाभ

दुहूँ दिसि परम उछाहु = दोनों ओर परम उत्साह है। मिला सुसाहिब सेवकहि, प्रभुहि सुसेवक लाहु = सेवक को उत्तम स्वामी और प्रभु को उत्तम सेवक मिला।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीराम-लक्ष्मण के तथा हनुमानजी के — दोनों ओर मन में परम उत्साह है। इधर सेवक हनुमानजी को उत्तम स्वामी मिला और उधर प्रभु को उत्तम सेवक प्राप्त हुआ।

तुलसीदास जी इस संतुलन को बार-बार दोहराते हैं। वे किसी एक पक्ष को श्रेष्ठ नहीं बताते — दोनों को समान लाभ हुआ।

शकुन की दृष्टि से इस दोहे का फल स्वामी-सेवक संबंधी प्रश्नों में स्पष्ट शुभ है। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ नियोक्ता-कर्मचारी, गुरु-शिष्य या नेता-अनुयायी का संबंध विषय हो। संदेश यह है कि जो संबंध बन रहा है, उसमें दोनों पक्ष लाभ में रहेंगे।

शकुन फल:

स्वामी-सेवक संबंधी प्रश्न का फल शुभ है। निम्नलिखित में:

  • नई नौकरी या नए कर्मचारी की नियुक्ति
  • गुरु-शिष्य संबंध या दीक्षा
  • व्यावसायिक साझेदारी या गठजोड़
  • किसी संस्था या टीम से जुड़ने का निर्णय
  • पारस्परिक लाभ वाला कोई भी संबंध

इस दोहे के आने पर स्वामी-सेवक संबंधी प्रश्न का फल शुभ है। जो संबंध बन रहा है उसमें दोनों पक्षों को लाभ होगा — निःसंकोच आगे बढ़ें।

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