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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 3 — शबरी से सीता का समाचार और प्रभु का फल-ग्रहण; चिंता के समय शुभ समाचार से संतोष का शकुन।

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शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। तृतीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का तीसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसके दोहे बताते हैं कि सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है।

शबरी का प्रसंग — चिंता के समय शुभ समाचार से संतोष।

मूल दोहा: काहि सबरी सब सीय सुधि, प्रभु सराहि फल खात। सोच समयँ संतोष सुनि सगुन सुमंगल बात॥३॥

शब्दार्थ:

  • काहि = कहा
  • सबरी = शबरी
  • सीय सुधि = सीताजी का समाचार
  • सराहि = प्रशंसा करके
  • फल खात = फल खाते हैं
  • सोच समयँ = चिंता के समय
  • संतोष = संतोष
  • सुमंगल बात = कल्याणकारी बात

प्रभु सराहि फल खात = प्रभु प्रशंसा करके फल खाते हैं। सोच समयँ संतोष सुनि = चिंता के समय शुभ बात सुनकर संतोष होगा।

भावार्थ / व्याख्या:

शबरी ने प्रभु से सीताजी का सब समाचार कहा और प्रभु प्रशंसा करके उसके दिए फल खाते हैं। यह प्रसंग रामायण के सबसे हृदयस्पर्शी क्षणों में से एक है।

तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — चिंता के समय श्रेष्ठ कल्याणकारी बात सुनकर संतोष होगा।

शबरी वनवासी थीं और समाज में उनका कोई स्थान नहीं था। फिर भी उन्हीं से वह सूचना मिली जो श्रीराम को चाहिए थी। शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है और विशेष रूप से बताता है कि सहायता वहाँ से आएगी जहाँ से आप अपेक्षा नहीं कर रहे — किसी साधारण या उपेक्षित व्यक्ति से।

शकुन फल:

यह शकुन चिंता के समय शुभ समाचार और संतोष का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • किसी शुभ समाचार या सूचना की प्रतीक्षा
  • अनपेक्षित स्रोत से मिलने वाली सहायता
  • लंबी चिंता के बाद मिलने वाली राहत
  • किसी साधारण या उपेक्षित व्यक्ति से सहयोग
  • भक्ति, सेवा और श्रद्धा का फल

इस दोहे के आने पर चिंता के समय शुभ समाचार मिलने का संकेत है। सहायता वहाँ से आएगी जहाँ से आपको अपेक्षा नहीं — किसी को छोटा न समझें।

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