रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 5 — ग्रामवासियों का सहज स्नेह; बिना पहचान के प्रेम और परदेश में विशेष सम्मान का शकुन।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। प्रस्तुत दोहा द्वितीय सर्ग के दूसरे सप्तक में पाँचवाँ स्थान पर है, जहाँ हर्ष और वियोग — दोनों प्रकार के प्रसंग आते हैं।
ग्रामवासियों का सहज प्रेम — बिना पहचान के भी स्नेह मिलने का शकुन।
मूल दोहा: ग्राम नारि नर मुदित मन लखन राम सिय देखि। होइ प्रीति पहिचान बिनु मान बिदेस बिसेषि॥५॥
शब्दार्थ:
- ग्राम नारि नर = गाँव के स्त्री-पुरुष
- मुदित मन = मन-ही-मन आनंदित
- देखि = देखकर
- प्रीति = प्रेम
- पहिचान बिनु = बिना परिचय के
- मान = सम्मान
- बिदेस = परदेश
- बिसेषि = विशेष रूप से
ग्राम नारि नर मुदित मन = गाँव के स्त्री-पुरुष मन-ही-मन आनंदित हैं। मान बिदेस बिसेषि = परदेश में विशेष सम्मान प्राप्त होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम, लक्ष्मण तथा जानकीजी का दर्शन करके गाँवों के स्त्री-पुरुष मन-ही-मन आनंदित हो रहे हैं। ये लोग उन्हें जानते तक नहीं थे, फिर भी उनके प्रति स्नेह उमड़ पड़ा।
तुलसीदास जी इस शकुन का फल बताते हैं — बिना पहचान के भी प्रेम होगा और परदेश में विशेष सम्मान प्राप्त होगा।
यह दोहा उन लोगों के लिए विशेष रूप से शुभ है जो नए स्थान पर जा रहे हैं, जहाँ कोई परिचित नहीं। यह आश्वासन देता है कि अपरिचित लोग भी सहायक और स्नेही सिद्ध होंगे।
शकुन फल:
यह शकुन परदेश में सम्मान और सहज स्नेह का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- नए शहर, देश या स्थान पर जाकर बसना
- विदेश में नौकरी, शिक्षा या व्यवसाय
- अपरिचित लोगों के बीच कार्य आरंभ करना
- नई जगह पर सहायता या समर्थन मिलना
- सामाजिक स्वीकृति और लोकप्रियता
इस दोहे के आने पर परदेश में विशेष सम्मान का संकेत मिलता है। अपरिचित लोग भी सहायक होंगे — नई जगह जाने में संकोच न करें।
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