रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 2 — लंका में हुए अपार अपशकुन जो हानि, भय और मृत्यु का संकेत देते थे; यह शकुन अनिष्ट सूचक है।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। प्रथम सर्ग के पाँचवें सप्तक का दूसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें राम-नाम के प्रभाव से बनने वाले शुभ योग की झलक मिलती है।
लंका में हुए अपशकुनों का वर्णन — यह दोहा अनिष्ट सूचित करता है।
मूल दोहा: तेहि अवसर रावन नगर असगुन असुभ अपार। होहिं हानि भय मरन दुख सूचक बारहिं बार॥२॥
शब्दार्थ:
- तेहि अवसर = उस समय
- रावन नगर = रावण का नगर (लंका)
- असगुन = अपशकुन
- अपार = बहुत अधिक
- हानि = नुकसान
- मरन = मृत्यु
- सूचक = संकेत देने वाले
- बारहिं बार = बार-बार
असगुन असुभ अपार = बहुत अधिक अशुभ अपशकुन हुए। होहिं हानि भय मरन दुख = हानि, भय, मृत्यु और दुःख होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
जिस समय जनकपुर में मंगल हो रहा था, उसी समय रावण के नगर लंका में अत्यधिक अशुभ अपशकुन हो रहे थे। ये अपशकुन बार-बार यह संकेत दे रहे थे कि हानि, भय, मृत्यु और दुःख आने वाला है।
तुलसीदास जी यहाँ एक गहरी बात कहते हैं — घटनाएँ अपनी छाया पहले भेज देती हैं। रावण के विनाश की भूमिका उसी दिन बन गई थी जिस दिन श्रीराम ने धनुष तोड़ा था, यद्यपि युद्ध वर्षों बाद हुआ।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्पष्ट रूप से अनिष्ट का सूचक है। यह चेतावनी देता है कि वर्तमान में लिए जा रहे निर्णय या चल रहे कार्य में हानि की प्रबल संभावना है। इस समय रुककर पुनर्विचार करना ही बुद्धिमानी है।
शकुन फल:
यह शकुन अनिष्ट सूचित करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी आवश्यक है:
- नया निवेश, ऋण या बड़ा आर्थिक निर्णय
- यात्रा या स्थान परिवर्तन का विचार
- विवाद, मुकदमा या शत्रुता बढ़ाने वाला कदम
- स्वास्थ्य संबंधी चिंता या शल्य-क्रिया
- कोई भी कार्य जिसे लेकर मन में संशय हो
इस दोहे के आने पर कार्य को टालना या स्थगित करना उचित है। यदि आगे बढ़ना अनिवार्य हो तो पूरी सावधानी, विशेषज्ञ की सलाह और वैकल्पिक योजना के साथ ही बढ़ें। श्रीराम का स्मरण और सत्कर्म इस समय सबसे बड़ा सहारा है।
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