वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप
दोहा :
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥249॥
तालाबों में कमल खिल…
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