जयंत की कुटिलता और फल प्राप्ति
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥ एक […]
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥ एक […]
तृतीय सोपान-मंगलाचरण श्लोक : मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरं वंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्॥1॥ धर्म रूपी
दोहा : सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥321॥ छोटे भाई लक्ष्मणजी और
चौपाई : भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत
दोहा : अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥309॥ तब अत्रिजी ने
दोहा : राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥ श्री रामचन्द्रजी
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥ करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥3॥ अतः
दोहा : बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥ राजा-रानी ने
दोहा : एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥280॥ सब
दोहा : प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥274॥ उस समय सब