जटायु-रावण युद्ध, अशोक वाटिका में सीताजी को रखना
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥ अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥4॥ गृध्रराज जटायु ने सीताजी […]
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥ अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥4॥ गृध्रराज जटायु ने सीताजी […]
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न
दोहा : करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥24॥ तब मारीच ने
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥ बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥3॥ खर-दूषण का
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥ पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥ शूर्पणखा
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥ दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥8॥ हे
दोहा : निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥ श्री रामजी
चौपाई : मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥ आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि
चौपाई : अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥1॥ फिर
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥2॥