Author name: Katha

तारा को श्री रामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अंगद को युवराज पद
॥ श्री रामचरितमानस ॥

तारा को श्री रामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अंगद को युवराज पद

तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥2॥ बतारा […]

बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार, तारा का विलाप
॥ श्री रामचरितमानस ॥

बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार, तारा का विलाप

दोहा : कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥7॥ बालि ने कहा-

सुग्रीव का वैराग्य
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सुग्रीव का वैराग्य

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥6॥ सुग्रीव ने कहा- हे

सुग्रीव का दुःख सुनाना, बालि वध की प्रतिज्ञा, श्री रामजी का मित्र लक्षण वर्णन
॥ श्री रामचरितमानस ॥

सुग्रीव का दुःख सुनाना, बालि वध की प्रतिज्ञा, श्री रामजी का मित्र लक्षण वर्णन

दोहा : तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ॥4॥ तब हनुमान्‌जी ने

श्री रामजी से हनुमानजी का मिलना और श्री राम-सुग्रीव की मित्रता
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामजी से हनुमानजी का मिलना और श्री राम-सुग्रीव की मित्रता

चौपाई : आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥ तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥1॥ श्री

मंगलाचरण
॥ श्री रामचरितमानस ॥

मंगलाचरण

श्लोक : कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥1॥ कुन्दपुष्प

संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिए प्रेरणा
॥ श्री रामचरितमानस ॥

संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिए प्रेरणा

जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान

शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पम्पासर की ओर प्रस्थान
॥ श्री रामचरितमानस ॥

शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश और पम्पासर की ओर प्रस्थान

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥ सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ

श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार
॥ श्री रामचरितमानस ॥

श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग, कबन्ध उद्धार

जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥29 ख॥ जिस प्रकार कपट

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