विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओं का उन्हें पहनना
बहुरि विभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥ लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥ फिर […]
बहुरि विभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥ लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥ फिर […]
चौपाई : करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु
दोहा : बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥ देवता हर्षित होकर फूल
चौपाई : पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥ समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥1॥
चौपाई : आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो॥ तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला॥1॥ सब
चौपाई : पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥ जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा। सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥4॥ यहाँ आधी
चौपाई : तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई॥ सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर
चौपाई : हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे॥ देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि
चौपाई : देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥ रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥1॥ विभीषण